भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर एक बार फिर से तनाव बढ़ गया है। भारत सरकार ने The Hague स्थित मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration) के हालिया फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि यह फैसला 'Null and Void' यानी अमान्य और शून्य है। भारत ने इस Court of Arbitration के गठन को ही गैर-कानूनी बताया है और इसकी किसी भी कार्यवाही में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है। यह पूरा विवाद पाकिस्तान की आपत्तियों के बाद शुरू हुआ था। सच तो यह है कि यह मामला सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि संप्रभुता का भी है।

मुख्य बातें
  • भारत ने सिंधु जल संधि पर Hague कोर्ट के फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
  • सरकार ने कहा कि कोर्ट का गठन ही गैर-कानूनी था, इसलिए इसका हर फैसला 'Null and Void' है।
  • यह विवाद जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रातले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स को लेकर है।
  • पाकिस्तान इन प्रोजेक्ट्स पर आपत्ति जताते हुए Court of Arbitration में गया था।
  • भारत का कहना है कि संधि के तहत पहले 'Neutral Expert' की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।
  • सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच World Bank की मध्यस्थता में हुई थी।

भारत ने क्यों ठुकराया Hague कोर्ट का फैसला?

भारत का रुख बिल्कुल साफ है। सरकार का मानना है कि पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। जब किसी विवाद को सुलझाने के लिए एक तय प्रक्रिया है, तो उसे तोड़कर सीधे Court of Arbitration में क्यों जाया गया? संधि में विवाद सुलझाने के लिए एक graded-mechanism यानी चरणबद्ध तरीका दिया गया है। भारत ने इसी के तहत एक 'Neutral Expert' की नियुक्ति की मांग की थी। लेकिन, पाकिस्तान उसी विवाद को लेकर Court of Arbitration पहुंच गया। भारत का तर्क है कि एक ही मुद्दे पर दो समानांतर प्रक्रियाएं नहीं चल सकतीं। क्योंकि यह संधि के मूल ढांचे के खिलाफ है, इसलिए भारत इस तथाकथित कोर्ट और उसके फैसले को कोई अहमियत नहीं देता। यह एक बड़ा कूटनीतिक कदम है।

क्या है सिंधु जल संधि और पूरा विवाद?

सिंधु जल संधि 19 सितंबर, 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच हुई थी। World Bank ने इसमें मध्यस्थता की थी। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की 6 नदियों का बंटवारा हुआ। पूर्वी नदियां — सतलुज, ब्यास और रावी — का पूरा कंट्रोल भारत को मिला। वहीं, पश्चिमी नदियां — सिंधु, झेलम और चेनाब — का पानी पाकिस्तान को दिया गया। हालांकि, भारत को इन पश्चिमी नदियों पर बिजली बनाने (Run-of-the-River projects) और कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार है। मौजूदा विवाद भारत के किशनगंगा (झेलम की सहायक नदी) और रातले (चेनाब नदी) हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स के डिजाइन को लेकर है। पाकिस्तान को डर है कि इन प्रोजेक्ट्स से उसके हिस्से के पानी के बहाव पर असर पड़ेगा।

अब आगे क्या होगा? भारत का अगला कदम

भारत के इस कड़े रुख के बाद मामला एक कानूनी और कूटनीतिक गतिरोध में फंस गया है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस कोर्ट की किसी भी कार्यवाही में शामिल नहीं होगा। इसका मतलब है कि भारत इस फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं है। यह कदम पाकिस्तान पर दबाव बनाने की एक रणनीति भी है ताकि वह बातचीत की टेबल पर वापस आए और संधि में तय प्रक्रिया का पालन करे। हालांकि, इससे दोनों देशों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण रिश्तों में और कड़वाहट आ सकती है। भविष्य में इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दोनों देशों को द्विपक्षीय बातचीत या किसी तीसरे पक्ष की निष्पक्ष मध्यस्थता का सहारा लेना पड़ सकता है। लेकिन फिलहाल, भारत अपने प्रोजेक्ट्स पर काम जारी रखने के अपने अधिकार पर कायम है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) आखिर है क्या?

देखिए, यह 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ एक समझौता है, जो सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे को नियंत्रित करता है। World Bank ने इसमें मध्यस्थता की थी। यह दुनिया की सबसे सफल जल-बंटवारा संधियों में से एक मानी जाती है, जिसने दो युद्धों के बावजूद काम किया है।

भारत इस कोर्ट के फैसले को क्यों नहीं मान रहा है?

सीधी बात यह है कि भारत के अनुसार, इस कोर्ट का गठन ही गलत तरीके से हुआ है। संधि में विवाद सुलझाने के लिए पहले 'Neutral Expert' के पास जाने का रास्ता है, जिसका पालन भारत कर रहा था। पाकिस्तान ने इसे दरकिनार कर सीधे कोर्ट का रास्ता चुना, जो संधि की शर्तों का उल्लंघन है।

क्या इस विवाद से पाकिस्तान को पानी मिलना बंद हो जाएगा?

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारत संधि की शर्तों का सम्मान करता है और पाकिस्तान को जाने वाले पानी को नहीं रोक रहा है। यह विवाद सिर्फ भारत द्वारा अपनी नदियों पर बनाए जा रहे हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स के तकनीकी डिजाइन को लेकर है, न कि पानी रोकने को लेकर।