नई दिल्ली। कोरोना महामारी कितनी जानलेवा थी, इसका अंदाज़ा शायद हम आज तक ठीक से नहीं लगा पाए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक ताज़ा रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 से 2023 के बीच कोरोना काल में दुनियाभर में हुई मौतें सरकारी आंकड़ों से लगभग तीन गुना ज़्यादा हैं। WHO का अनुमान है कि इस दौरान 2.21 करोड़ 'अतिरिक्त मौतें' (Excess Deaths) हुईं, जबकि आधिकारिक तौर पर कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा सिर्फ 70 लाख बताया गया है। ये आंकड़े सरकारों के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच एक बहुत बड़ी खाई दिखाते हैं। सच कड़वा है।

मुख्य बातें
  • WHO का बड़ा खुलासा: कोरोना से मौतें सरकारी आंकड़ों से 3 गुना ज़्यादा।
  • 2020 से 2023 के बीच दुनिया में 2.21 करोड़ 'अतिरिक्त मौतें' दर्ज की गईं।
  • सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ 70 लाख मौतें दिखाई गईं, यानी 1.5 करोड़ से ज़्यादा मौतें छिपाई गईं या गिनी नहीं गईं।
  • पुरुषों पर महामारी का असर ज़्यादा गंभीर रहा; उनकी मृत्यु दर महिलाओं के मुकाबले लगभग 50% अधिक थी।
  • 'एक्सेस डेथ' में सिर्फ कोरोना से सीधी मौतें नहीं, बल्कि चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण हुईं मौतें भी शामिल हैं।
  • The Lancet जैसी पुरानी स्टडीज़ में भारत में भी आंकड़ों में बड़े अंतर का दावा किया गया था, जो अब और पुख्ता लग रहा है।

WHO की रिपोर्ट ने खोली पोल, असल आंकड़े चौंकाने वाले

कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को थाम दिया था, ये हम सब जानते हैं। लेकिन इसकी असली कीमत कितनी बड़ी थी, ये अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। WHO की यह रिपोर्ट किसी एक देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक आईना है। रिपोर्ट में 'एक्सेस डेथ' का ज़िक्र है। अब आप पूछेंगे कि यह 'एक्सेस डेथ' क्या है? तो समझिए, यह उन मौतों का आंकड़ा है जो सामान्य हालात में नहीं होतीं। मतलब, अगर महामारी न आती तो पिछले सालों के औसत के हिसाब से जितनी मौतें होनी चाहिए थीं, उससे कहीं ज़्यादा हुईं। और यह अंतर 2.21 करोड़ का है। यह आंकड़ा सिर्फ़ वायरस से मरने वालों का नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों की भी कहानी कहता है जिन्हें समय पर इलाज नहीं मिला — क्योंकि हमारे health systems पूरी तरह चरमरा गए थे। अस्पतालों में बेड नहीं थे, ऑक्सीजन की कमी थी और डॉक्टर भी कम पड़ गए थे।

पुरुषों पर कहर बनकर टूटी महामारी

इस रिपोर्ट का एक और पहलू है जो सोचने पर मजबूर करता है। महामारी ने पुरुषों और महिलाओं पर अलग-अलग असर डाला। WHO के data के अनुसार, पुरुषों में मृत्यु दर महिलाओं की तुलना में लगभग 50% ज़्यादा थी। इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। कुछ experts का मानना है कि पुरुषों की जीवनशैली, धूम्रपान जैसी आदतें और बीमारियों से लड़ने की उनकी शारीरिक क्षमता इसमें एक बड़ा रोल निभाती है। वहीं, सामाजिक कारण भी हो सकते हैं, जैसे कि पुरुष अक्सर स्वास्थ्य समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और देर से डॉक्टरी सलाह लेते हैं। जो भी हो, यह साफ है कि कोरोना का कहर पुरुषों पर ज़्यादा भारी पड़ा। यह data भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों को बनाने में मदद कर सकता है, ताकि ऐसी किसी भी आपदा के समय लिंग के आधार पर होने वाले असर को कम किया जा सके।

भारत की तस्वीर और भी चिंताजनक? आंकड़ों पर उठते सवाल

जब भी कोरोना से हुई मौतों की बात होती है, भारत का ज़िक्र ज़रूर आता है। WHO की इस वैश्विक रिपोर्ट के बाद The Lancet जैसी प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिकाओं में छपी पुरानी रिपोर्ट्स फिर से चर्चा में आ गई हैं। एक पुरानी स्टडी में दावा किया गया था कि भारत में 31 दिसंबर, 2021 तक ही 40 लाख से ज़्यादा 'एक्सेस डेथ' हुई थीं, जो उस वक्त के सरकारी आंकड़ों से कई गुना ज़्यादा था। सोचो ज़रा। दूसरी लहर के दौरान हमने जो मंज़र देखा — गंगा में तैरती लाशें और श्मशानों में लगी लंबी कतारें — वो इन स्टडीज़ को कहीं न कहीं सही साबित करता है। कई लोगों की मौतें तो घर पर ही हो गईं और उनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं बन पाया। ग्रामीण इलाकों में testing की कमी और health infrastructure का अभाव भी एक बड़ी वजह थी कि सही आंकड़े कभी सामने नहीं आ पाए। यह रिपोर्ट एक तरह से भारत सरकार के लिए भी एक मौका है कि वो अपने data collection के तरीकों की समीक्षा करे ताकि भविष्य में ऐसी गलतियां न हों।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

'एक्सेस डेथ' (Excess Deaths) का क्या मतलब है?

देखिए, इसका सीधा मतलब है 'अपेक्षा से ज़्यादा मौतें'। विशेषज्ञ पिछले कुछ सालों के औसत मृत्यु आंकड़ों को देखते हैं और फिर किसी खास अवधि (जैसे कोरोना काल) में हुई कुल मौतों से उसकी तुलना करते हैं। जो अतिरिक्त मौतें निकलती हैं, उन्हें ही 'एक्सेस डेथ' कहा जाता है। इसमें कोरोना से सीधी और अप्रत्यक्ष, दोनों तरह की मौतें शामिल होती हैं।

सरकारी आंकड़े इतने कम क्यों हैं?

सीधी बात ये है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। एक, शुरुआती दौर में testing की भारी कमी थी। दूसरा, कई मौतें घर पर हुईं जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। तीसरा, ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी के कारण मौत का सही कारण दर्ज नहीं हो पाया। और कुछ मामलों में, यह भी संभव है कि सरकारों ने अपनी छवि बचाने के लिए आंकड़े कम दिखाए हों।

इस रिपोर्ट के क्या मायने हैं?

देखिए, इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा मतलब यह है कि हमें महामारी की असली भयावहता का पता चलता है। यह सरकारों को भविष्य की स्वास्थ्य आपदाओं के लिए बेहतर तैयारी करने में मदद करेगी। यह रिपोर्ट data में पारदर्शिता की अहमियत को भी रेखांकित करती है। जब हमारे पास सही आंकड़े होंगे, तभी हम सही policy बना पाएंगे और जानें बचा पाएंगे।