भवानीपुर की हार: ममता की राजनीति को बड़ा झटका
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक शायद ही किसी ने की होगी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी परंपरागत सीट भवानीपुर से चुनाव हार गई हैं, और उन्हें हराने वाले कोई और नहीं, बल्कि उनके पूर्व विश्वासपात्र और भाजपा के विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी हैं।
यह महज एक विधानसभा सीट की हार नहीं है। यह ममता बनर्जी की उस राजनीतिक पहचान पर सीधा प्रहार है जो उन्होंने दशकों की मेहनत से बनाई थी। भवानीपुर वह सीट थी जहाँ से उन्होंने 2021 में नंदीग्राम की हार के बाद वापसी की थी। उसी सीट को खोना उनके लिए दोहरा दर्द है।
सुवेंदु अधिकारी कभी तृणमूल कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद नेताओं में से एक थे। 2020 में उनका भाजपा में शामिल होना ममता के लिए बड़ा आघात था। 2021 में नंदीग्राम में हुई पहली टक्कर ने सारे देश का ध्यान खींचा था। इस बार भवानीपुर में हुई इस भिड़ंत ने उस प्रतिद्वंद्विता को और गहरा कर दिया है।
भवानीपुर की जनसांख्यिकी हमेशा से जटिल रही है। यहाँ गुजराती, मारवाड़ी, बंगाली हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं का मिला-जुला समीकरण है। इस बार गैर-बंगाली समुदायों का एकजुट मतदान भाजपा के पक्ष में रहा। साथ ही शहरी मध्यम वर्ग में पिछले कुछ वर्षों से जमा हो रही नाराज़गी भी इस नतीजे में दिखी।
सुवेंदु ने भवानीपुर में जिस तरह का जनसंपर्क अभियान चलाया, वह उल्लेखनीय था। वे खुद को केवल भाजपा उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि एक आम बंगाली की आवाज़ के रूप में पेश करते रहे। उनकी जनसभाओं में भीड़ और स्थानीय संपर्क ने चुनावी समीकरण बदल दिए।
ममता बनर्जी की हार के संवैधानिक परिणाम भी हैं। मुख्यमंत्री के रूप में बने रहने के लिए उन्हें छह महीने के भीतर किसी अन्य सीट से उपचुनाव जीतना होगा। बंगाल की राजनीति का अगला अध्याय अब इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमेगा।




